Wednesday, October 02, 2013

JUDGES LIKE SOLOMON

This speech was delivered by Chief Justice Yatindra Singh on 14-09-2013 on the occasion foundation laying ceremony of Chhattisgarh Judicial Academy, Bilaspur.  

माननीय राज्यपाल श्री शेखर दत्त जी, देवियों और सज्जनों,
जय जोहार, नमस्ते,
सभी न्यायाधीशों के पास कानून की डिग्री है। वे कानून के जानकार हैं। जिस न्यायिक अकादमी की भवन का आज शिलान्यास किया है उनका चयन प्रतियोगी परीक्षा के बाद होता है। वे सभी उत्तम हैं।  फिर, इस प्रशिक्षण संस्थान की क्या आवश्यकता? क्या जरूरत है इतना पैसा खर्चा करने की?

सोलॉमन (अरबी में सुलेमान) सन् 970 से 931 ईसा पूर्व से इज़राईल का राजा था वह बुद्घिमान था, न्यायप्रिय था।

एक दिन एक ही घर में रहने वाली दो महिलाएं उनके पास एक बच्चे के साथ आईं। दोनों उस बच्चे की माँ होने का दावा कर रही थीं।  उनमें से एक ने कहा रात में जब वह सो रही थी तब, दूसरी ने, अपने मरे बच्चे को उसके बच्चे से बदल दिया। दूसरी ने इस बात से इंकार किया और बोली कि मरा हुआ बच्चा पहली महिला का है।

कुछ विचार विमर्श उपरांत सुलेमान ने एक तलवार मंगाई और कहा कि निष्पक्ष रहने के लिये यह आवश्यक है कि बालक को दो हिस्सों में काट दिया जाए, और प्रत्येक महिला को आधा भाग दिया जाए।


यह सुनने के पश्चात् एक महिला ने कहा,

'महाराज, टुकड़े करने से तो यह मर जायगा। इसे दूसरी महिला को दे दें।'
दूसरी ने कहा,

'महराज, अब तो यह मान लिया गया है कि बच्चा मुझे दे दिया जाय तब इसे मुझे देने में क्या संकोच। लेकिन अबभी यदि कोई संशय हो तब निष्पक्षता के लिए, इसे दो टुकड़ों में ही बांटना उचित होगा।'  
यह सुनने के बाद सुलेमान ने, बच्चे को पहली महिला को दे दिया। क्योंकि असली मां ही अपने बच्चे को मरने नहीं दे सकती। यह सुलेमान के फैसले के नाम से प्रसिद्घ है।

मैं ऐसा कोई कानून का महाविद्यालय नहीं जानता जो सुलेमान की तरह न्याय करने की शिक्षा देता हो।  मैं ऐसी किसी प्रतियोगी परीक्षा के बारे में भी नहीं जानता जो सुलेमान की तरह फैसला करने वालों का  चयन कर सके।  यही कारण है कि कानून की डिग्री होने तथा प्रतियोगी परीक्षा में सफल होने के बावजूद भी, प्रशिक्षण संस्थान की आवश्यकता है।

अधिकतम न्यायिक अकादमियां दण्ड प्रक्रिया संहिता, व्यवहार प्रक्रिया संहिता, भारतीय दण्ड संहिता जैसे कानून के विधि विषयों में प्रशिक्षण देने पर जोर देती हैं।  यह वे विषय हैं जो कि पहले ही पढ़ाये जा चुके होते हैं। लेकिन यह अकादमियां यह सिखाने में असफल रहती हैं कि किस तरह सुलेमान की तरह न्याय किया जाये। हम यह उम्मीद करते हैं कि छत्तीसगढ़ न्यायिक अकादमी न्याय पर अधिक बल देगी न कि कानून पर। यहां से प्रशिक्षित न्यायाधीशों की अदालतें न्याय की अदालत होंगीं न केवल कानून की जानकारी रखने वाली।

बम्बई में, सबसे पहली अंग्रेजी अदालत १६७२ में शुरू हई। राजपाल ऑन्गेर ने इसके उदघाटन पर सही ही कहा, 

'Laws though in themselves never so wise and pious are but a dead letter and of little force except there be due and impartial execution of them'.
कानून अपने आप में, कभी भी अच्छे और उचित हैं लेकिन वे मरे के समान हैं और उनमें कोई दम नहीं यदि उनका निष्पक्ष क्रियान्वयन न हो।  

हमारे प्रयासों के फलस्वरूप, इस वर्ष के मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन में यह संकल्प पारित किया गया है कि न्यायालय के परिसर में सौर ऊर्जा के उपयोग की संभावना पर पहले विचार किया जाये।  इस संकल्प के बाद हमारे द्वारा निर्माण किया जाने वाला यह पहला भवन है। इसलिये हमने इसे सौर ऊर्जा से संचालित करने का प्रस्ताव किया है।

इस बात का प्रयत्न किया गया है कि इसका निर्माण इस तरीके से किया जायेगा कि दिन के समय, इसमें पर्याप्त सूरज की रोशनी रहे, गर्मियों में यह ठंडा रहे, और सर्दियों में गर्म—ताकि बिजली की खपत कम हो। यह न केवल प्रशिक्षण में, बल्कि भवन की इमारत में भी, एक मिसाल हो।

इसके लिए धन की आवश्यकता होगी।  तेरहवें वित्त आयोग हमें न्यायिक अकादमी की संरचना हेतु 15 करोड़ रूपये दिये हैं।  लेकिन, यह राशि अपर्याप्त हो सकती है। हमें कुछ और धन की आवश्यकता पड़ेगी, हमें यह आशा है कि राज्य सरकार इस कमी को पूरा कर देगी और हमें इस भवन को न केवल संरचना, बल्कि प्रशिक्षण तरीकों में भी एक उदाहरण बनने में मदद करेगी।

माननीय राज्यपाल जी यहां उपस्थित हैं और मैं बात समाप्त करने से पहले, उनसे एक परम्परा को बदलने पर विचार करने की प्रार्थना करता हूं।

उत्तरप्रदेश में राज्यपाल द्वारा शपथ हेतु मुख्य न्यायाधीश राजभवन जाते हैं। लेकिन, मुख्य न्यायाधीश द्वारा शपथ हेतु राज्यपाल इलाहाबाद आते हैं।  यह विशिष्टता इलाहाबाद की थी परन्तु वहां से यह कोलकाता में गयी। मैं निवेदन करूंगा कि यह परंपरा छत्तीसगढ़ में भी अपनाई जाए। राज्यपाल का न्यायालय में आना, हमेशा इसका गौरव बढ़ाता है।

छत्तीसगढ़ के अगले मुख्य न्यायाधीश की शपथ पर, मैं यहां नहीं होऊँगा पर मैं चाहूंगा कि उनकी शपथ यहां इस उच्च न्यायालय बिलासपुर में हो, न कि राजभवन रायपुर में।

आप का दिन न केवल आप सब के लिये शुभ हो, मंगलमय हो पर उच्च न्यायालय के स्वर्णिम इतिहास में, मील का पत्थर बने। इसी आशा, इसी कामना के साथ।
नमस्कार, जय हिन्द।


Hon'ble Governor of Chhattisgarh Shri Shekhar Dutt Ji, Ladies and Gentlemen,
Jai Johar, Nmastey, a very good afternoon to all of you.

All Judges have law degree:  they know the laws.  The Judicial Academy is for the judges of District judiciary, who are selected after competitive examination: they are the best.  Then what is the need of having training institute; spending so much of money.

Solomon (Sulayman in Arabic) was a king of Israel from 970 to 931 B.C.   He was  a king of great wisdom; said to be a just and wise ruler.  

One day two women, living in the same house, came to him with an infant child.  Both of them claimed to be the mother of the child.  One of them claimed that the other woman had exchanged her dead child with her child in the night.  The other denied this and said that the dead child belonged to the other woman.  

After some deliberation, King Solomon called for a sword and said that in order to be fair, the child must be split into two and each woman be given half of the child.  Upon hearing this, one of them said, 
'O Lord, give the child to her, just don't kill him'.  
The other one said,
'It has been conceded; the child may be given to me or else to be fair, he may be divided'.  
Upon hearing this, King Solomon declared the first woman to be the  mother of the child as she was the one, who had shown a mother's compassion.   This was the judgment  of Solomon.

I know of no law college that teaches the wisdom of King Solomon.  I also do not know of any competitive examination that can select a person, who can decide like Solomon.  It is for this reason that despite having a law degree and passing through competitive examination, a training institute is necessary.

Most of the judicial academies emphasise law subjects, namely, CrPC, CPC, IPC that have already been taught.  What many of them fail to do is, to teach Solomon's wisdom; his justness. We hope that the Chhattisgarh Judicial Academy will emphasise on justice rather than law; the judges trained here will render Justice rather than becoming merlely scholar of law; their courts will be court of Justice and only court of law. 

Aungier, the Governor, While inaugurating the first British court of justice in Bombay in 1672,  rightly pointed out, 'Laws though in themselves never so wise and pious are but a dead letter and of little force except there be due and impartial execution of them'.

It was because of our insistence that in this year's Chief Justices' Conference, a resolution was passed that the High Courts may consider exploring the possibility of using solar energy in court premises.  After this resolution, this is the first building that we are constructing and it will also be solar powered.   It will be so constructed so as to have enough sun light during day time,  it will be cold during summer and hot during winter, so that electricity consumption is reduced.  Not only its training , but the building will also be an example to emulate.  

This will require some funds.  The 13th Financial Commission has already given us   15 crores towards infrastructure of the judicial academy but this may not be sufficient.  We will need some funds; we hope that the State Government will meet the shortfall, and  help us in making this building an example not only in its structure but in training methods as well.

Hon'ble Governor is here and before I end, I will like him to consider changing a tradition.

In Uttar Pradesh, Chief Justice goes to Raj Bhawan for the Governor's oath but Governor comes to Allahabad for the Chief Justice's oath.  This was typical of Allahabad but from there it spread to Calcutta and I request that it may be adopted here.  A visit by Governor to the court, always enhances its prestige. 

I will not be here for the oath of the next Chief Justice of the Chhattisgarh High Court, but I wish that it takes place here in this building rather than at Raj Bhawan, Raipur.

Good day to all of you.
Jai Hind.
Note: The second and the third pictures are from the Wikipedia

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